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विशेष प्रकार की सम्पत्तियों को प्रयोग करने के प्रतिफल में जो धनराशि प्रयोग करने वाले व्यक्ति के द्वारा उन, सम्पत्तियों के स्वामी को दी जाती है, उसे अधिकार शुल्क (१०५३७) कहते हैं। जैसे-खान (1९५) के स्वामी को खनिज, पदार्थ निकालने वाले व्यवसायी से मिलने वाली धनराशि, पुस्तक के लेखक को प्रकाशक से मिलने वाली धनराशि, किसी, गुप्त विधि (5९८९४ ?10८९४५७) के स्वामी को उसे प्रयोग करने वाले से मिलने वाली धनराशि, पेटेन्ट के स्वामी को उसे, प्रयोग करने वाले से मिलने वाली धनराशि आदि सब अधिकार शुल्क (१०५३॥५) कहलाती हैं। प्राचीन काल में जब भारत, में राजा महाराजाओं का बोलबाला था तब अधिकार-शुल्क शब्द कवल राजाओं को अपनी खानों से जो किराया प्राप्त, होता था उसी के लिए प्रयोग किया जाता था लेकिन अब इसका प्रयोग विस्तश्त अर्थ में किया जाता है। अधिकार-शुल्क, की कुछ प्रमुख परिभाषायें निम्नलिखित हैं :, , , , , , , , जे० आर० बाटलीबॉय के शब्दों में, “अधिकार-शुल्क से अभिप्राय उस धनराशि से है जो कि एक व्यक्ति द्वारा दूसरे, व्यक्ति को उसके द्वारा दिये गये विशेषाधिकार के प्रतिफल में देय होती है, जैसे एक पुस्तक प्रकाशित करने का, अधिकार, एक पेटेन्ट वस्तु बनाने व बेचने का अधिकार या खान खोदने का अधिकार।”, , विलियम पिकिस के अनुसार, “किसी सम्पत्ति के प्रयोग के सम्बन्ध में एक व्यक्ति को देय पारिश्रमिक अधिकार-शुल्क, होता है, चाहे इस सम्पत्ति को उस व्यक्ति से किराये पर लिया हो या खरीद लिया हो। इस धनराशि की गणना उस, सम्पत्ति के प्रयोग में हुये उत्पादन या बिक्री की मात्रा पर की जाती है।”, , उपर्युक्त वर्णित अधिकार-शुल्क की परिभाषाओं के विश्लेषणात्मक आधार पर यह कहा जा सकता है कि अधिकार-शुल्क, का आशय उस भुगतान की गई धनराशि से है जो कि दूसरों की कुछ विशेष प्रकार की सम्पत्तियों के प्रयोग करने के, अधिकार के बदले किराये के रूप में दिया जाता है। इस भुगतान की गई धनराशि की गणना अधिकार प्रयोग से हुये, उत्पादन या बिक्री की मात्रा पर आधारित होती है। ऐसी सम्पत्ति खान (॥४॥1०5), पेटेन्ट (2०६७४), कापीराइट, (८००५/४५910), व्यापार चिन्ह (7199९ |४०॥0, गुप्त निर्माण-विधि (5९८९६ |/गार्पा4८परं09 ?7०८९५७), यांत्रिक, ज्ञान ([९८॥॥८३।| ॥(10५/९५७९) आदि हो सकती हैं।, , , , खानों के स्वामी को जमींदार ([9101010), कॉपीराइट का स्वामी, लेखक (/॥०01), पेटेन्ट के स्वामी को पेटेन्टी, (?००1(४९) कहते हैं। जमींदार, लेखक या पेटेन्टी और पट्टेदार ([०५५९९) के बीच एक लिखित या माँखिक समझौता, होता है जिसमें अधिकार प्रयोग की समस्त शर्ते (0०701४०75) व अधिकार शुल्क भुगतान की धनराशि व विधि तय की, जाती है। यह समझौता मौखिक भी हो सकता है परन्तु भविष्य में आपसी झगड़ों से बचने के लिए लिखित समझौता ही, अधिक उचित व न्यायपूर्ण रहता है।