Notes of No Class, English & Hindi & Sociology & Education official hindi.pdf - Study Material
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कायलियी हिन्दी, , संघ की राजभाषा के रूप में प्रयुक्त हिन्दी कार्यालयी हिन्दी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के, पश्चात् संविधान में हिन्दी को राजभाषा तो घोषित कर दिया गया किन्तु अंग्रेजी, सहभाषा के रूप में जुड़ी रही। संविधान निर्माताओं ने निर्णय लिया कि, सम्प्रभुता-सम्पन्न भारतीय गणतन्त्र की राजभाषा नागरी में लिखी हिन्दी होगी।, हिन्दी प्रशासनिक कार्यालयों में जब तक हिन्दी कार्य करने में पूर्णतः समर्थ नहीं, होगी तब तक सहभाषा अंग्रेज़ी का प्रयोग रहेगा। इस अंवधि में हिन्दी के विकास, के लिए भाषा आयोग और संसदीय उपसमिति बनायी जायेगी। किन्तु सत्ता पर, छाए रहने वाले प्रमुख प्रशासनिक कर्मचारी अंग्रेजी की छत्रछाया में ही काम करते, रहें। यही कारण है कि राजभाषा अधिनियम सन् 1965, राजभाषा नियम सन्, , अप 5८56 5२८७ के, रन,, 1976 तथा समय-समय पर विभिन्न प्रशासनिक आदेशों द्वारा हिन्दी के प्रयोग पर , बल दिया जाता रहा।, , कार्यालयों की हिन्दी सौन्दर्यमूलक रचनात्मक साहित्यिक हिन्दी नहीं है बल्कि, जीविकोपार्जन का सशक्त माध्यम है। यह रोजगार का औजार है और औजार का, “ ब्र्योग अंग्रेजी पर आश्रित न होकर सर्वजन सुलभ एवं व्यावहारिक होना चाहिए।, इसलिए सहज, सरल सुबोध एवं प्रवाहयुक्त हिन्दी ही कार्यालय में काम करनें की, भाषा होनी चाहिए। आओ के अनुसार सरल भाषा वह है जो स्वाभाविक हो,, जिसकी वाक्य रचना सीधी और सुलझी हुई हो, जिसमें किसी प्रकार का आइम्बर,, अलंकार और वक्र प्रयोग न हो, जो मन की बात को ठीक-ठीक व्यक्त कर सके।, कार्यालयों में अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी में काम करना आसान है। हिन्दी, हमारी राष्ट्रभाषा व संपर्क भाषा है। अधिकांश जनता/कुर्मचारी उसी कार्य को, अच्छी प्रकार से सम्पन्न कर सकते हैं जिसे वे अच्छी तरह समझते हैं। कार्यालयों, में हिन्दी भाषा के प्रति सौतेले व्यवहार का कारण केवल नकारात्मक दृष्टिकोण है।, समाज में अपनी विशिष्ट छवि बनाए रखने की मानसिकता के कारण अंग्रेजी के, , व्यूह से मुक्त नहीं हो पा रहे। ः, * कार्यालयों में अधिकाधिक कामकाज हिन्दी में सम्पन्न हों, इसके लिए, सरकारी तथा गैर-सरकारी स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार के, लगभग सभी विभागों ने, विभिन्न संस्थाओं ने जैसे केन्द्रीय सचिवालय, हिन्दी, परिषद्, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय आदि ने हिन्दी में विविध प्रकार की आवश्यक, अ्ध्सान्िगी लिन्दीं ४ 27, , इल्ातथ6 00० स्तउत्यातल,
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सामग्री कर्मचारियों की सुविधा के लिए दितरित की है। हिन्दी में काम करने पर, प्रस्कार आदि देने की व्यवस्था की गई है। भारत सरकार ने केन्द्रीय कार्यालयों के, विभिन्न कार्यों में हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने 5: लिए आदेश निकाले। जिन कर्मचारियों, , को हिन्दी का ज्ञान न था, भारत सरकार की ओरे से उन्हें हिन्दी में कार्य करने के, , लिए प्रशिक्षित किया गया। सरकारी प्रकाशनों आदि के हिन्दी अनुवाद करवाए, गये! पारिभाषिक शब्दाबली-निर्माण तथा प्रकाशन हिन्दी में किए जा रहे हैं। हमारे, देश में राजभाषा हिन्दी दिवस मनाया जाता है। सरकार की ओर से हिन्दी के, प्रचार-प्रसार के लिए अनेक प्रयास किया जा रहे हैं। किन्तु उनका परिणाम, शत-प्रतिशत प्रकट नहीं हो रहा।, कार्यालयी कामकाज में हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिए अधिकारियों तथा, कर्मचारियों में हिन्दी के प्रति रुचि जागृत करने की आवश्यतका है। अधिकारियों, तथा कर्मचारियों में हिन्दी के प्रयोग के लिए इच्छा-शक्ति तभी जागेगी तब उनका, हिन्दी के प्रति सकारात्मक चिन्तन हो। आन्तरिक भावना मातृभाषा के प्रति, श्रद्धानत होगी। राजभाषा का प्रयोग कर उसका समुचित सम्मान करना अपना, कर्त्तव्य समझेगी। हिन्दी भाषा के कामकाज में नित्यप्रति प्रयोग का अभ्यास कर, उसके प्रति मोह उत्पन्न होना स्वाभाविक हो जाएगा। इच्छाशक्ति, रुचि तथा, अभ्यास के सहारे कार्यालयों में हिन्दी भाषा में कार्यों को सम्पादित किया जा, सकता है।, कायलिंयी हिन्दी के प्रयोग क्षेत्र : कार्यालयों में कार्यों को संपादित करने, की एक सुनिश्चित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह प्रक्रिया पत्र को दर्ज करने से, लेकर उसका उत्तर भेजने तक पूर्ण होती है। इस प्रक्रिया में किए जाने वाले विविध, कार्यों को पाँच प्रयोग-स्षेत्रों में रखते हुए वर्गीकृत किया जा सकता है। गा जा अकार, कार्यालयी हिन्दी के पाँच प्रयोग क्षेत्र हैं : (1) टिख्रर्ण, (2) प्रारूपण, (3) न, (4) प्रतिवेदन, (5) अनुवाद 1४७ छॉंवृय ५ "को ता ४ पा., , 8..., , उतार 0कउतयातल,
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अंतर्गत आते है। इस कार्यालयी साहित्य की अपनी विशिष्ट भाषा होती है। जिसमें, कार्यालयी प्रयुक्ति की भाषागत संरचना और शाब्दिक अन्विति महत्वपूर्ण भूमिका, निभाती है। कार्यालयी साहित्य की प्रकृति के आधार पर कार्यालयी भाषा के, निम्नलिखित विशेषताएँ मानी जा सकती है | कार्यालयी साहित्य के अनुसार कार्यालयी, , भाषा का स्वरूप निर्धारित होता है। तथा कार्यालयी भाषा के निम्न लिखित, . विशेषताएँ माने जा सकते है।, , 1. निर्वेयत्किकता:-- कार्यालय में सामान्यतः कोई व्यक्तिगत नहीं होता हैं, सभी कार्यालयों में कार्य करने का तरिका, एवं आधिकार स्पष्ट किये होते, है। इन कार्यालयों में कार्य करने से पूर्व अधिकारी या कर्मचारी के अधिकार, स्पष्ट कर दिये जाते हैं। इन्ही अधिकार क्षेत्र में रहकर व्यक्तियों को कार्य, करना होता है। आधिकारी एवं कर्मचारियों के अपने-अपने स्तर एवं, अधिकार होते है। सभी कार्यालयों में उच्च पदस्थ अधिकारी उनके अधिक, अधिकारियों को कार्य करने के आदेश दे सकता है। यह आदेश उनके, अधिकार क्षेत्र. के सिमित होते है। वह अधिकारी व्यक्तिगत, निजी कार्यों, को इनमें शामिल नहीं कर सकता, इसी तरह उच्च पदस्थ अधिकारियों के, आदेशों या सूचनाओं पर उनके भी नीचे के अधिकारी या कर्मचारियों को, , गे संप्रेषित कर सकते है। वह अकधकारी व्यक्तिगत रूप में कुछ न कहकर, , | निर्वेबक्तिक रूप में कहता है। जैसे- पत्र भेजा जा रहा है, सूचित किया, , । जा रहा है, आदि | इसलिए कार्यालय के सभी पत्रादि प्रशासन की ओर से, , | लिख जाते हैं। यही कारण है कि कार्यालयी हिन्दी में कर्मवाच्य की, प्रधानता रहती है। जिसे- मन्त्रालय की सहमति,/स्वीकृति- प्राप्त कर ली, गई है।, , 2. तथ्यों में स्वपूर्णता और स्पष्टताः- कार्यालयी हिन्दी का स्वरूप सरल, स्पष्ट तथा सुबोध होना चाहिए। इस हिन्दी का वह स्वरूप विभिन्न, प्रशासनिक कार्यों के लिए सरकारी तथा कार्यालयों में स्पंष्ट होना चाहिए।, कार्यालयी हिन्दी में तथ्यों पर अधिक बल दिया जाता है। साथ में यह, अपेक्षा की जाती है कि वे तथ्य अपने आप में पूर्ण तथा स्पष्ट हो। प्रशासन, के क्षेत्र में संदेह और भ्रांति को अलंकार नहीं, भाषा का दोष माना जाता, है। इसके अभाव में कभी-कभी पत्रों की उपेक्षा हो जाती है तथा कार्रवाई, में विलंब हो जाता है। कार्यालयी पत्रों में अस्पष्ट बाते विचार निर्णय में, बाधा ला सकते है। किसी बात का संस्मरण करना है तो मूल पत्र की, , पत्रसंख्या अवश्य लिखनी चाहिए, वरना संस्मरण केवल अस्पष्ट एवं अधूरा, रह जायेगा।
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3. यथासंभव असंदिग्धता:- प्रशासन हेतु विभिन्न कार्यालयों में हिन्दी का, प्रयोग किया जाता है। कार्यालयी हिन्दी का रूप सामान्य बोलचाल की, हिन्दी से बहुत-कुछ भिन्न होता है। इस भिन्नता का प्रमुख कारण हैकार्यालयी हिन्दी की विशिष्ट प्रयुक्ति, शब्दावली प्रथा वाक्य संरचना। इस, आधारभूत संरचना में सामान्य बोलचाल या प्रादेशिक भाषा का प्रभाव, पडना स्वाभाविक है। किंतु इस कारण क्लिष्टता आ सकती है। यदि भाषा, में क्लिष्टता अस्पष्टता और अप्रचलित प्रयोग होता है तो संदिग्धार्थकता, की गुंजाईश रहती है। संदिग्धार्थकता प्रशासन के लिए घातक होती हैं।, जो मूल बात कही गयी है उसका एक ही अर्थ होना चाहिए। द्वि-अर्थी या, , अनेकाओ होनेककार में या तो बाधा पडती है या उसमें कोई गलती, होने की सं होती है।, , 4. वर्णनात्मकता:- कार्यालयी हिन्दी में महत्वपूर्ण बातों का वर्णन आवश्यक, होता है। कार्यालयी हिन्दी में आवश्यक तथ्यों का विवरण देना ही चाहिए।, इस विवरण में सम्बन्धित विषय की सारी सामग्री को क्रमवश दिया जाता, हे। इसमें प्रत्येक मामले का संक्षिप्त विवरण देते हुए मुख्य कथ्य का, परिचय दिया जाता है। उसके बाद ही निष्कर्ष देना उचित समझा जाता, है। तथ्यों का वर्णन देने में मूल्यांकन की गुंजाइश कम रहती है । अतः:, कार्यालयी हिन्दी में तथ्यों का सही-सही निरूपण होना आवशयक है।, , 5. तकनीकी - अर्धतकनीकी भाषा प्रयोग:-- कार्यालयी भाषा मुख्यतः: तकनीकीअर्धतकनीकी होती है। इसी कारण सरकारी- कामकाज की भाषा के रूप, में प्रयुक्त होने वाले शब्द या वाक्य किसी विशेष क्षेत्र के लिए रूढ़ हो जाते, है और इन शब्दों या वाक्यों का प्रयोग इससे बाहर किया जाए तो वे, अटपटे लगते हैं। तकनीकी- भाषा, सामान्य बोलचाल की हिन्दी में प्रायः, सार्थक और उपयुक्त नहीं होते। किंतु यह बात और वाक्य-विन्यास हिन्दी, की प्रकृति के अनुकूल है। कार्यालयी हिन्दी अंग्रेजी वाक्य-- विन्यास से, अधिक प्रभावित हे, क्योंकि हिन्दी में वाक्य अंग्रेजी वाक्यों के अनुवाद के, माध्यम से आये हैं।