Notes of IX A (2022-23), हिन्दी & हिन्दी अनुच्छेद - Study Material
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1७४७:७४ 0४४0४ ७८४ ७७४७७ जाओ ४ सं ली+ ४७४४: 00४, नहीं ।' कवि श्री वियोगी हरि लिखते हैं-जो मतुष्य पराधीन नहीं उनके लिए स्वर्ग-नरक में अन्तर नहीं। इसके विपरीत जो मनुष्य पराधीन हैं,, उनके लिए स्वर्ग भी नरक के समान होता है। स्वाधीनता जीवन का अमृत है और पराघीनता विष । स्वाघीन प्राणी को भावनाओं पर कोई अंकुश, नहीं होता। वह स्वेच्छा से विचरण करता है। इंसान तो क्या पक्षो भी पिंजरे में रहकर स्वादिष्ट भोजन को अपेक्षा आजाद रहकर भूखा रहना अधि, पक पसंद करते हैं। किसी कवि ने कहा है-“हम पक्षी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक तौलियों से टकगश़कर, पुलकित पंख दूठ, जाएँगे।", , , , का, , , , | ॥5ए8077८८एणाएछ', 62 ओसवाल सी:बी.एस.ई. चैप्टरवाइस प्रश्न बैंक ०77, हिंदी "आह कक्षा - ९, , ह14, कमर तोड़ महँगाई, अथवा, महँगाई : एक विकट समस्या, , संकेत बिन्दु-() महँगाई का कारण, (8) माँग और आपूर्ति में अन्तर, (कं) सरकारी नीति, (४) बढ़ती महँगाई के दुष्परिणाम।, , वर्तमान समय में निप्न-मध्यम वर्ग महँगाई की समस्या से त्रस्त है। महँगाई सुरसा के मुख के समान बढ़ती हो जा रही है। महँगाई बढ़ने के, कई कारण हैं जिनमें जनसंख्या वृद्धि प्रमुख है। अत: महँगाई रोकने के लिए बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगाना अनिवार है। उत्पादन में, कमी तथा माँ में वृद्धि होना महँगाई का प्रमुख कारण है। कभी-कभी सूखा, बाढ़ तथा अतिवृष्ट जैसे प्राकृतिक प्रकोप भी उत्पादन को प्रभावित, करते हैं। वस्तुओं को जमाखोरी भी महँगाई बढ़ने का प्रमुख कारण है। जमाखोरी से शुरू होती है-कालाबाजारी, दोषपूर्ण वितरण प्रणाली तथा, अंधाधुम्ध मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति। सरकारी अंकुश का अप्रभावी होना भी महँगाई तथा जमाखोरी को बढ़ावा देता है। इस जानलेवा महँगाई ने, आम नागरिकों की कमर तोड़कर रख दी है। अब उसे दो जून की रोटी जुटाना तक कठिन हो गया है। पौष्टिक आहार का मिलना तो और भी, कठिन हो गया है। महँगाई बढ़ने का एक कारण यह भी है कि हमारी आवश्यकताएँ तेजी से बढ़ती चली जा रही हैं, महंगाई को सामान्य व्यक्त, की आय के सदर्भ में देखा जाना चाहिए। सरकार को शीघ्र महैँगाई पर नियन्त्रण करना होगा।, , 5. विज्ञापनों की न्यारी दुनिया, अथवा, विज्ञापन और हमारा जीवन अथवा विज्ञापनों का जीवन पर प्रभाव, , संकेत-बिन्दु-() विज्ञापन के साथन, (1) विज्ञापन का उद्देश्य, (४) विज्ञापनों का महत्व व प्रभाव।, , आज का युग विज्ञापनों का युग है। रेडियो, दूरदर्शन, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ आदि इसके मुख्य साधन हैं। विज्ञापन का उद्देश्य, है- प्रचार-प्रसार द्वारा प्रचारकर्ता और आम जनता के बीच सम्पर्क स्थापित करना। सामान्य रूप से व्यापारी या उत्पादक उपभोक्ता को अपना, माल बेचने के लिए विज्ञापनों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार विज्ञापन उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सेतु का कार्य करते हैं। ये एक ओर, उत्पादों का माल जनता तक पहुँचाते हैं, दूसरी ओर जनता को नई-नई जानकारियाँ देकर नए उत्पादों से परिचित कराते हैं, उन्हें शिक्षित कर, रहे हैं।, , विज्ञापन विविध प्रकार के होते हैं-व्यापारिक, रौक्षिक, प्रवेश और नियुक्ति सम्बन्धी, जन-जागरण सम्बन्धी, धार्मिक, मनोरंजन सम्बन्धी, आदि। ये विज्ञापन हमारे मन को निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं। आज कोई भी ग्राहक सामान खरीदते समय कंवल प्रसिद्ध ब्राण्डों पर ही, नजर दौड़ाता है। नमक हो या साबुन, पंखे हों या फ्रिज-सबके चुनाव में विज्ञापन हमे प्रेरित करते हैं। ऐसे में विज्ञापनों का यह दायित्व बनता है, 'कि बे ग्राहकों को लुभावने दृश्य दिखाकर गुमराह न करें, बल्कि उन्हें अपने उत्पाद के गुणों से परिचित कराएँ। तभी उचित माल, उचित ग्राहक, तक पहुँचेगा और विज्ञापन अपने लक्ष्य में सफल होगा।, , , , , , 6. परोपकार, , संकेत-बिन्दु-6) परोपकार का अर्थ, (8) परोपकार से लाभ, (18) परोपकारी व्यक्तियों के उदाहरण।, , मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। परस्पर सहयोग उसके जौवन का महत्वपूर्ण अंग है। परस्पर सहयोग के अभाव में समाज का अस्तित्व, है नहीं रह जाता। व्यासजी ने कहा है-'परहित साधन हो पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना ही पाप है।' परोपकार के समान दूसरा धर्म नहीं है।, परोपकार का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रकृति में देखने को मिलता है, मेघ दूसरों के लिए वर्षा करते हैं, वायु दूसरों के लिए चलती है तथा सरिता दूसरों, कौ प्यास बुझाने के लिए बहती है। पुष्प अपनी सुगन्ध बिखेर कर, वृक्ष स्वयं धूप सहकर और पथिकों को छाया प्रदान करके हमें परोपकार की, प्रेरणा देते प्रतीत होते हैं। परोपकार करने वाला मनुष्य पूज्य बन जाता है। पराहित के कारण गांधौजी, सुकरात, राजा शिवि तथा ऋषि दर्धोचि ने, अपना जीवन बलिदान कर दिया। बुद्ध, महावीर जैसे महापुरुषों ने तप्त मानवता को परोषकार का पावन मार्ग दिखाया। पंचशील का सिद्धान्त भी, परोषकार की ही देन है। हमारा कर्तव्य है कि हम इन उपकारी महापुरुषों के जीवन का अनुकरण करें। यही हमारे जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।, परत हमें यह परोपकार केवल सेवा की भावना को ही लेकर करना चाहिए। परोषकार करतें समय तो हमें यह अभिमान भी नहीं होना चाहिए., कि हमने व्यक्त के लिए यह भलाई का कार्य किया। निः््वार् भाव से हमें परोपकार के कार्यों मैं समय लगाना चाहिए।, , , , , , "| #5एएएणएए९एणाएः, , 7. मीडिया का सामाजिक उत्तरदायित्व, , संकेत बिन्दु-0) जागरूकता, (४) निजी जीवन में दखल देना, (पा) वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना।, , मीडिया समाज का महत्वपूर्ण स्तम्भ होता है। चाहे वह प्रिन्ट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। इसका उद्देश्य समाज में जागरूकता, स्थापित कर लोगों को जागरूक बनाकर उनमें जन-जागरण का कार्य करना होता है। वर्तमान समय में समाज के अन्दर जन-साधारण में चेतना, आ रही है। किसी भी समस्या के लिए समाचार-पत्रों को माध्यम बनाकर अपनी बात पहुँचाने के लिए धरना, प्रदर्शन, जाम आदि कार्य करते, हैं। इन सबके पीछे मीडिया के द्वारा नागरिकों को जागरूकता प्रदान की गई है। मीडिया को महत्वपूर्ण भूमिका होती है कि ये किसी के निजी, जीवन में हस्तक्षेप न करे। मौडिया का सामाजिक दायित्व यह है कि वह जन साधाएण में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दे। यह देखने में आता है, कि इस दायित्व का भी निर्वाह करने में मीडिया सफल रहा है।, , 18. परीक्षा के कठिन दिन, , संकेत बिन्दु-) परोक्षा की उपयोगिता, (४) परीक्षा-जीवन की कसौटी, (४0) परीक्षा में सफलता के उपाय।, , विद्याथी के अर्जित ज्ञान एवं योग्यता की परख परीक्षा के माध्यम से को जा सकती है। जो विद्यार्थी प्रतिदिन की कक्षाओं, परीक्षा को तैयारो भी करते जाते हैं, उन्हें परीक्षा का सामना कस्ने से डर नहीं लगता। वे तो परीक्षा का इंजतार करते हैं। उन्हें परीक्षा के दिन, कठिन नहीं, सखद लगते हैं। जिस प्रकार सोने की गणवत्ता को कसौटी पर परख्ा जाता है उसो प्रकार विद्यार्थी की योग्यता की परख परोक्षा की, , , , , , , , , , साथ-साथ