Notes of Semester 2 Honours Pol.Sc, Political Theory & Political Thought Karl Marx Hindi Notes - Study Material
Page 1 :
॥५-€ ६3) चल हक चि हा, कार्ल मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद, प्रो. (डॉ.) सुरेन्द्र कुमार, विभागाध्यक्ष-डतिहात्र विभाग,, पटना विश्वविद्यालय, पटना-800005, 1४०01 ६०. 9835463960, , हनागतां। 10: (प्राशवाध्प्राशावात850(68छ791.००7, , , , , , , , ऐतिहासिक भौतिकवाद, मार्क्स ने अपने सिद्धान्त “द्न्द्वात्मक भौतिकवाद' (9८०८३ 1४४८४७॥५॥) का प्रयोग ऐतिहासिक, , , , व सामाजिक विकास की व्याख्या करने के लिए किया। उसने बताया कि मानव-इतिहास में होने वाले, , , , विभिन्न परिवर्तनों और घटनाओं के पीछे आर्थिक शक्तियों का हाथ होता है। इसलिए उसने अपने *द्वन्द्दात्मक, , , , भौतिकवाद' के सिद्धान्त के आधार पर इतिहास की व्याख्या को ऐतिहासिक भौतिकवाद या “इतिहास की, भौतिकवादी' व्याख्या (७8टापक्रा॥आं८ प्राश्प्नालक्रांणा ० प्रां॥09) का नाम दिया, आगे चलकर अनेक, , , , विद्वानों ने इस सिद्धान्त को इतिहास की आर्थिक व्याख्या! (8८णाणाएं2 प्राध्फ्ञाथक्षांणा रण प़ांज्रण9),, , “आर्थिक नियतिवाद' (8८णाणां० 9&८गांएंआ) आदि नामों से भी पुकारा गया। इस प्रकार मार्क्स का, , , , यह सिद्धान्त भ्रमजाल में फंस गया। मार्क्स के अनुसार ऐतिहासिक विकास का निर्णायक तत्व उत्पादन, , , , शक्तियां हैं। उसके आर्थिक नियतिवाद के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी करता है, उसका निर्णय आर्थिक या, , , , भौतिक कार्यों द्वारा होता है। मनुष्य आर्थिक शक्तियों का दास है। इस सिद्धान्त के अनुसार मार्क्स ने यह, बताया है कि इतिहास का निर्धारण अन्तिम रूप में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार होता है।” इस, , , , प्रकार मार्क्स के सिद्धान्त का नाम इतिहास की आर्थिक व्याख्या होना चाहिए। लेकिन मार्क्स ने 'भौतिकवाद', , , , , , शब्द का प्रयोग हीगल के आशीर्वाद से अपने सिद्धान्त को अलग व उलटा रखने के लिए इसका नाम, , ऐतिहासिक भौतिकवाद ही रखा।, सिद्धान्त की व्याख्या, मार्क्स का कहना है कि मनुष्य जाति को राजनीति, धर्म विज्ञान आदि का विकास करने से पहले, , , , , , , , खाने-पीने की, निवास की और कपड़ों की जरूरत होती है। इसलिए प्रत्येक देश की राजनीतिक संस्थाएं,, , , , उसकी सामाजिक व्याख्या, उसके व्यापार और उद्योग, कला, दर्शन, रीतियां, आचरण, परम्पराएं, नियम,, , , , धर्म तथा नैतिकता जीवन की भौतिक आवश्यकताओं द्वारा प्रभावित रूप धारण करती हैं। एंजिल्स के, अनुसार “एक निश्चित समय में एक निश्चित जाति में जीवन-निर्वाह के तात्कालिक भौतिक साधनों का, , , , , , उत्पादन एवं आर्थिक विकास की मात्रा एक ऐसी नींव होती है जिस पर उस जाति की राज्य विषयक, , , , संस्थाएं, कानूनी विचार, कला एवं धार्मिक विचार आधारित होते हैं।”' मार्क्स ने आगे कहा है कि इतिहास, 2798९ 10110
Page 2 :
की सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियां जीवन की भौतिक अवस्थाओं के कारण होती हैं, सत्य तथा, , , , न्याय के अमूर्त विचारों या भगवान की इच्छा के कारण नहीं। जीवन की भौतिक अवस्थाओं से उसका, , , , तात्पर्य वातावरण, उत्पादन, वितरण और विनिमय से है, और उनमें भी उत्पादन सबसे अधिक महत्वपूर्ण, है। मार्क्स ने अपने इस सिद्धान्त को भूत और भविष्य दोनों में क्रान्तियों के लिए किया है। भूतकाल की, क्रान्ति सामंतवादियों के खिलाफ बुर्जुआवादियों की थी और भविष्य की क्रान्ति बुर्जुआवादियों (पूंजीपतियों), के विरूद्ध सर्वहारा वर्ग (मजदूर वर्ग) की होगी।, मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या इन शीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है:1. भोजन की आवश्यकता -इस सिद्धान्तका मौलिक तत्व यह है कि मनुष्य के जीवन के लिए भोजन, , , , , , पहली आवश्यकता है। उसका जीवित रहना इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने लिए, , , , , , प्राकृतिक साधनों से कितना भोजन प्राप्त करता है। अत: मनुष्य के समस्त क्रिया-कलापों का, आधार उत्पादन प्रणाली है और इसी से समाज की रचना होती है।, , , , 2. उत्पादन की शक्तियां - मार्क्स कहता है कि उत्पादन की समस्त शक्तियों में प्राकृतिक साधन,, , , , मशीन, यजन्न, उत्पादन, कला तथा मनुष्यों के मानसिक और नैतिक गुण शामिल हैं। ये शक्तियां, , , , समस्त मानव और सामाजिक इतिहास की निर्धारक हैं। किसी युग की कानूनी और राजनीतिक, , संस्थाएं सांस्कृतिक उत्पादन के साधनों की उपज है। धार्मिक विश्वासों और दर्शन का आधार भी, , , , उत्पादन की शक्तियां ही हैं। एंजिल्स ने कहा है-“इतिहास के प्रत्येक काल में आर्थिक उत्पादन, और विनिमय की पद्धति तद्जनित सामाजिक संगठन का वह आधार बनाते हैं जिसके ऊपर, , , , उसका निर्माण होता है और केवल जिसके द्वारा ही उनके राजनीतिक और बौद्धिक जीवन की, , , , व्याख्या की जा सकती है।'” इस तरह कहा जा सकता है कि उत्पादन और वितरण की प्रणाली, , , , में परिवर्तन होने पर उसके अनुरूप ही सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संस्थाओं में भी, , , , , , परिवर्तन आते हैं। उत्पादन की शक्तियां ही सामाजिक और राजनीतिक ढांचे का आधार है। इस, , , , ढांचे से मनुष्यों के पारस्परिक सम्बन्ध निर्धारित होते हैं और यही “उत्पादन के सम्बन्ध' भी, , , , कहलाते हैं। अत: उत्पादन की शक्तियां ही समस्त मानवीय संस्थाओं की रूपरेखा का आधार है।, मनुष्यों के समस्त क्रिया-कलाप इसी की परिधि में आते हैं।, 3. परिवर्तनशील उत्पादन-शक्तियों का सामाजिक सम्बन्धों पर प्रभाव - मार्क्स का कहना है कि, , , , , , “जीवन के भौतिक साधनों की उत्पादन पद्धति सामाजिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक जीवन की, , , , समस्त क्रियाओं को निर्धारित करती है।” उत्पादन की शक्तियां सदैव समान न रहकर परिवर्तित, , , , होती रहती है और साथ में सामाजिक सम्बन्धों को भी परिवर्तित करती है। यही कारण है कि, , , , औद्योगिक क्रान्ति से पहले हस्तचलित यत्नों के युग में समाज का स्वरूप सामंतवादी था और, , , , औद्योगिक क्रान्ति के बाद वाष्पचलित तथा अन्य ऊर्जाचालित यत्रों के प्रयोग के युग में अर्थात, , , , मशीनी युग में औद्योगिक पूंजीवादी समाज की स्थापना हुई है। मार्क्स का विश्वास है कि यह, , 798९ 20110
Page 3 :
विकास (उत्पादन शक्तियों का विकास) समानान्तर चलता है और यदि यह विकास (उत्पादन, , , , शक्तियों का विकास) समानान्तर चलता है और यदि कृत्रिम उपायों से इसके रास्ते में रूकावट, , , , डालने का कोई प्रयास किया जाता है तो स्वाभाविक रूप से संकट का जन्म होता है। समाजवादी, व्यवस्था ऐसे सभी दोषों से मुक्त रहती है। अत: यह बात सही है कि परिवर्तनशील उत्पादन, शक्तियां ही सामाजिक सम्बन्धों का नए सिरे से निर्धारण करती हैं।, , , , - उत्पादन एवं उत्पादन शक्ति के विकास की द्न्द्रवाद से प्राप्ति - मार्क्स का कहना है कि उत्पादन, की शक्तियों में तब तक परिवर्तन चलता रहता है जब तक की उत्पादन की सर्वश्रेष्ठ अवस्था नहीं, आ जाती। इसी के आधार पर मार्क्स ने पूंजीवाद को समाजवाद की दिशा में ले जाने का प्रयास, , , , किया है। इस तरह पुरानी व्यवस्था नष्ट हो जाती है और नवीन व्यवस्था का जन्म होता है।, , , , उत्पादन शक्तियों का पूर्णता: की तरफ विकसित व परिवर्तित होते रहना ही सामाजिक परिवर्तन, व विकास का आधार है।, , . आर्थिक व्यवस्था और धर्म - मार्क्स ने धर्म की आलोचना की है। वह इसका पूर्ण रूप से विरोध, करते हुए कहता है कि “धर्म दोषपूर्ण आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है और यह अफीम के नशे, की तरह है।” यह पूंजीपतियों द्वारा मजदूर वर्ग को अनेक दु:खों से दूर रखने या दुःख भूलाने, का साधन है। धर्म का डर दिखाकर पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग को स्वर्गलोक की कल्पना कराता, है। इससे वे यह अनुभव करते हैं कि एक दिन वे अभावों तथा चिंताओं से मुक्त होकर सुखी, जीवन का उपभोग अवश्य करेंगे।, , , , . इतिहास की अनिवार्यता में विश्वास - मार्क्स इतिहास की अनिवार्यता में विश्वास करते हुए कहता, , , , है कि “उत्पादन की शक्तियों के अनुकूल जिस प्रकार के उत्पादन सम्बन्धों की आवश्यकता होगी,, वे अवश्य की अवतरित होंगे। मनुष्य केवल उनके आने में देरी कर सकता है या उन्हें शीघ्रता से, , , , ला सकता है, स्थायी रूप से रोक नहीं सकता।” इस तरह मार्क्स परिवर्तनों को अवश्यम्भावी, , , , मानता है और मनुष्य के नियत्रण से बाहर की बात स्वीकार करता है।, , , , . इतिहास का काल विभाजन - मार्क्स ने उत्पादन के सम्बन्धों या आर्थिक दशाओं के आधार पर, इतिहास को इन युगों में बांटा है1. आदिम साम्यवाद का युग अथवा प्राचीन साम्यवाद - यह युग इतिहास का प्रारम्भिक, , , , काल है। इस युग में मानव की आवश्यकताएं अत्यन्त सीमित थी। वह फल-फूल खाकर, अपनी भूख मिटा लेता था। इस युग में कोई वर्ग संघर्ष नहीं था। इस युग में व्यक्तिगत, सम्पति का अभाव था। उत्पादन के साधनों पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं था।, , , , , , समाज शोषक और शोषित वर्गों में नहीं बंटा हुआ था। संयुक्त श्रम के कारण उत्पादन की, , , , शक्तियों पर सबका अधिकार था। सभी कार्य व्यक्ति द्वारा सामूहिक रूप से किए जाते थे।, , 798९ 3 ०110
Page 4 :
सभी व्यक्ति सहयोग व समानता के सिद्धान्त का पालन करते थे। इस युग में कोई, , , , विषमता नहीं थी। लेकिन यह व्यवस्था अधिक दिन तक नहीं चली।, , , , 2. दासत्व युग अथवा समाज - व्यक्तिगत सम्पत्ति के उदय ने आदिम साम्यवाद को समाप्त, कर दिया और उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्वहोने के कारण दास-युग का, प्रारम्भ हुआ। अब व्यक्ति के शिकार के स्थान पर खेती करने लगा और पशु पालने लग, गया। इस युग में शक्तिशाली व्यक्ति उत्पादन के साधनों पर अधिकार जताने लगे और, कमजोर व्यक्ति उनके अधीन हो गए। इससे समाज में स्वामी और दास दो वर्ग बन गए।, उत्पादन के साधनों पर जिसका कब्जा होता था वह स्वामी तथा उत्पादन के साधनों से, , , , वंचित व्यक्ति दास बन गए। स्वामी दासों के श्रम का इच्छानुसार प्रयोग करने लग गए।, , , , स्वामी बड़ी कठोरता व निर्दयता से दासों का शोषण करने लग गए। दासों पर स्वामियों, , , , का पूरा अधिकार होता था। जैसे-जैसे स्वामियों के पास आर्थिक शक्ति बढ़ गई वैसे ही, दास प्रथा भी कुरुप होती गई, दासों के अधिक शोषण से दासों में विद्रोह की भावना का, जन्म हुआ और विद्रोह को कुचलने के लिए उत्पीड़न के नए साधन राज्य का जन्म हुआ।, राज्य ने शोषक वर्ग के ही हितों को सुरक्षित बनाया। इस युग में वर्ग-संघर्ष का जन्म, , , , हुआ, अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर दास-प्रणाली अपने अन्तर्विरोधों के कारण नष्ट होने, , , , लगी और उसके स्थान पर सामंतवादी प्रणाली का जन्म हुआ।, , , , 3. सामन्तवादी युग अथवा समाज - दास-युग की समाप्ति के बाद मानव समाज ने सामन््तवादी, युग में प्रवेश किया। इस युग में आजीविका का प्रमुख साधन कृषि था। इस युग में समस्त, भूमि राजा के अधीन थी। राजा ने भूमि को अपने सामन्तों में बांठा हुआ थे। ये सामंत, , , , आवश्यकता पड़ने पर राजा की हर तरह से मदद करते थे। ये सामंत कुलीन व्यक्ति थे।, , , , इन्होंने भूमि को छोटे-छोटे किसानों में बांट रखा था। किसानों पर सामन्तों का नियंत्रण, था। किसान सामंतों को ही अपने स्वामी मानते थें इस युग में उत्पादन के साधनों पर, सामंतों तथा शासक वर्ग का अधिकार था। इस युग में छोटे-छोटे उद्योगों का जन्म भी हो, , , , चुका था। कानून और धर्म सामन््तों तथा शासक वर्ग के हितों के ही पोषक थे। इस युग, , , , में किसानों का अत्यधिक शोषण होता था और उनक दशा दासों की तरह थी।, 4. पूंजीवादी युग अथवा समाज - मध्य युग की समाप्ति पर सामन््त युग की उत्पादक शक्तियों, , , , तथा उत्पादन-सम्बन्धों के विरूद्ध आवाज उठानी शुरू कर दी। नगरों में व्यापारी वर्ग ने, , , , , , नए-नए आविष्कारों का लाभ उठाकर उत्पादन प्रणाली में आश्चर्यजनक परिवर्तन किए और, उद्योगों का तेजी से विकास होने लगा। कोयले और भांप की शक्ति के आविष्कार ने, , औद्योगिक क्रान्ति को जन्म दिया। अब कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था का स्थान उद्योगों ने, , , , , , लेना शुरू कर दिया। अब पूंजीपतियों ने अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए श्रमिकों का, , 7०8९ 40110
Page 5 :
सहारा लेना शुरू किया और उन्हें कम वेतन देकर उनका शोषण करना शुरू कर दिया।, , , , इस तरह औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप समाज दो वर्गों पूंजीपति तथा श्रमिक वर्ग, में बंट गया। सामाजिक सम्बन्धों में आए नवीन परिवर्तनों से वर्ग-संघर्ष उग्र होने लग, गया। ऐसा संघष आज भी विद्यमान है। पूंजीपतियों द्वारा श्रमिक वर्ग का शोषण कोई नई, बात नहीं है। उनका शोषण लम्बे समय से होता आ रहा है। आज भी श्रमिक वर्ग पूंजीपति, वर्ग के शोषण का शिकार है।, , , , . समाजवादी युग अथवा समाज - श्रमिकों का अत्यधिक शोषण श्रमिकों को संगठित होने, , , , के लिए बाध्य करता है और विद्यमान व्यवस्था के खिलाफ क्रान्ति करने के लिए प्रेरित, , करता है। रूस की 1917 की क्रान्ति द्वार जार की तानाशाही का अन्त करना तथा, , , , सर्वहारा वर्ग की तानाशाही स्थापित होना इसका प्रमुख उदाहरण है। पूंजीपति वर्ग द्वारा, , , , दिए गए कष्टों से छुटकारा पाने के लिए क्रान्ति के सिवाय अन्य कोई उपाय श्रमिकों के, पास नहीं है। यद्यपि यह क्रान्ति चीन और रूस में ही आई है। विश्व के अनेक पूंजीवादी, देश आज भी बेहिचक श्रमिकों का शोषण कर रहे हैं। मार्क्स का विश्वास था कि पूंजीवाद, , , , में ही अनेक विनाश के बीज निहित हैं। इसका विनाश अवश्यम्भावी है। इसके अन्त पर, , , , ही नए समाज व सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होगी जो अगले चरण में पूर्ण साम्यवाद, का रूप ले लेगा।, . साम्यवादी युग अथवा समाज - सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति के बाद उत्पादन के साधनों पर, , , , सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित होगा और संक्रमणशील अवस्था से गुजरने के, , बाद समाजवादी व्यवस्था पूर्ण साम्यवाद का स्थान ले लेगी। इसे राज्यविहीन समाज की, , , , स्थिति प्रकट होगी। समाज में पूर्ण समानता और साम्य का साम्राज्य स्थापित होगा।, , , , पूंजीपति वर्ग बिल्कुल लुप्त हो जाएगा और समाज में श्रमजीवियों का वर्ग ही शेष बचेगा।, विरोधी वर्ग के अभाव में वर्ग संघर्ष भी समाप्त हो जाएगा। शोषण के सभी साधन भी, लुप्त हो जाएंगे। इससे आदर्श समाज की अवस्था आएगी। मार्क्स ने इस व्यवस्था की दो, विशेषताएं बताई हैं, 1. यह अवस्था वर्ग-विहीन होगी। इसमें शेाषक व शोषित दो वर्ग न होकर उत्पादन, , , , के साधनों का स्वामी बहुसंख्यक वर्ग श्रमिक वर्ग या सर्वहारा वर्ग होगा।, , , , राजनीतिक शक्ति के प्रयाग की आवश्यकता न रहने पर राज्य नाम की सस्थाका, , स्वयं लोप हो जाएगा। क्योंकि राज्य पूंजीपति वर्ग के शोषण का प्रभावशाली, , , , साधन होता है। श्रमिक वर्ग को इसकी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी।, , 7०8९ 50110